ग्रेटर नोएडा: में रीढ़ की हड्डी (स्पाइन) से जुड़ी गंभीर समस्याओं से जूझ रहे चार मरीजों का सफल उपचार किया गया। अस्पताल के विशेषज्ञ डॉक्टरों ने आधुनिक सर्जिकल तकनीकों और बहुविषयक चिकित्सा देखभाल के माध्यम से मरीजों की जटिल समस्याओं का इलाज किया। उपचार के बाद मरीजों की स्थिति में सुधार हुआ और उन्होंने दोबारा चलना-फिरना शुरू कर दिया।

अस्पताल की ओर से जारी प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, उपचारित मरीजों की उम्र 16 से 44 वर्ष के बीच है। इनमें स्कोलियोसिस, रीढ़ की हड्डी में गंभीर टेढ़ापन, गर्दन की हड्डियों के बीच डिस्क खिसकने और कमर की नसों पर दबाव जैसी समस्याएं शामिल थीं। डॉक्टरों ने मरीजों की स्थिति के अनुसार सर्जरी की अलग-अलग तकनीकों का इस्तेमाल किया।
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72 डिग्री तक मुड़ी रीढ़ की हड्डी का सफल उपचार
पहले मामले में कुशीनगर के 20 वर्षीय सिद्धार्थ सिंह और नोएडा की 16 वर्षीय राधिका चंदेला स्कोलियोसिस से पीड़ित थे। सिद्धार्थ की रीढ़ की हड्डी में गंभीर टेढ़ापन था, जो 72 डिग्री तक पहुंच गया था। वहीं, राधिका की रीढ़ में विकृति के कारण उनकी पीठ के मांसपेशियों और निचले हिस्से के मिलन की जगह पर परेशानी हो रही थी, जिससे उन्हें काफी दर्द होता था।
दोनों मरीजों का जनरल एनेस्थीसिया के तहत ऑपरेशन किया गया। सर्जरी के दौरान विशेष रॉड और स्क्रू की मदद से रीढ़ की हड्डी को सीधा करने, सही स्थिति में लाने और स्थिरता प्रदान करने का प्रयास किया गया। ऑपरेशन के बाद दोनों मरीजों ने चलना शुरू कर दिया और उनकी रिकवरी में लगातार सुधार देखा गया।
गर्दन की डिस्क खिसकने से हाथ में हो रहा था तेज दर्द
तीसरा मामला दिल्ली के 44 वर्षीय जतिन त्यागी का था। उनकी गर्दन में रीढ़ की हड्डियों के बीच की डिस्क खिसक गई थी, जिससे नसों पर दबाव पड़ रहा था। इसके कारण उनके बाएं हाथ में तेज दर्द और सुन्नपन की समस्या हो रही थी।
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डॉक्टरों ने पहले रीढ़ को स्थिरता देने और आईसीयू में निगरानी के बाद उनकी सर्जरी की। इसमें एंटीरियर सर्वाइकल डिस्केक्टॉमी एंड फ्यूजन (ACDF) तकनीक का इस्तेमाल किया गया। इस प्रक्रिया के तहत प्रभावित डिस्क को हटाकर नसों पर पड़ने वाले दबाव को कम किया गया और रीढ़ को स्थिरता देने के लिए केज, प्लेट, स्क्रू और बोन ग्राफ्ट का इस्तेमाल किया गया।
सर्जरी के बाद मरीज को हाथ के दर्द से राहत मिली और सुन्नपन की समस्या में भी सुधार हुआ। इसके बाद उन्होंने खड़े होना और अगले दिन से चलना शुरू कर दिया।
कमर की नसों पर दबाव से चलना हुआ था मुश्किल
चौथा मामला आगरा के 30 वर्षीय गौतम का था। उन्हें पीठ के निचले हिस्से में गंभीर दर्द था, जो बाएं पैर तक जा रहा था। इसके चलते उन्हें सुन्नपन और झनझनाहट की समस्या हो रही थी। स्थिति यह थी कि वह पांच मिनट से अधिक चलने में सक्षम नहीं थे।
डॉक्टरों ने छोटे चीरे के माध्यम से एंडोस्कोपिक डिस्केक्टॉमी की। इसके अतिरिक्त हाई-डेफिनिशन एंडोस्कोप की मदद से नस पर दबाव डालने वाले डिस्क के हिस्से को हटाया गया, ताकि आसपास के ऊतकों को कम से कम नुकसान पहुंचे।
उपचार के बाद मरीज की स्थिति में सुधार हुआ और अस्पताल से छुट्टी मिलने से पहले ही उन्होंने चलना शुरू कर दिया।
विशेषज्ञ डॉक्टरों ने आधुनिक तकनीक पर दिया जोर
फोर्टिस अस्पताल ग्रेटर नोएडा के ऑर्थोपेडिक्स विभाग के निदेशक डॉ. हिमांशु त्यागी ने कहा कि रीढ़ की समस्याएं व्यक्ति की चलने-फिरने की क्षमता, स्वतंत्रता और जीवन की गुणवत्ता को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकती हैं। समय पर बीमारी की पहचान, सही सर्जिकल तकनीक और विशेषज्ञों की देखरेख से मरीजों को बेहतर उपचार उपलब्ध कराया जा सकता है।
उन्होंने कहा कि आधुनिक तकनीकों की मदद से कम से कम नुकसान पहुंचाने वाली सर्जरी और ऑपरेशन के बाद उचित देखभाल के माध्यम से मरीजों की रिकवरी को बेहतर बनाने में मदद मिलती है।
वहीं, फोर्टिस अस्पताल ग्रेटर नोएडा की फैसिलिटी निदेशक बिंदु शर्मा ने कहा कि इन चार मरीजों के उपचार में सर्जरी, नर्सिंग और विभिन्न चिकित्सा विशेषज्ञों की टीम ने मिलकर काम किया। उन्होंने मरीजों और उनके परिवारों को उपचार तथा रिकवरी के दौरान सहायता उपलब्ध कराने की प्रतिबद्धता भी जताई।
अस्पताल के अनुसार, इन चार मामलों में मिली सफलता आधुनिक स्पाइन सर्जरी, समय पर निदान और विशेषज्ञ चिकित्सा देखभाल के महत्व को दर्शाती है।






